Archive for May 2015
शिक्षा
By : SONWANI
मुख्य राजमार्ग से कटती एक संकरी सड़क आठ किलोमीटर के बाद नहर पर समाप्त हो जाती है। नहर पार जाने के लिए कच्चा पुल एकमात्र साधन है। जब नहर में अधिक पानी छोड़ा जाता है, तब पुल टूट जाता है और नाव से नहर पार जाया जाता है। यह अस्थायी पुल जिसे नहर पार के गाँववाले खुद बनाते हैं, बरसात के महीनों में भी अधिक पानी के आ जाने पर टूट जाता है। सरकार ने कभी पुल को पक्का करने की नहीं सोची। नहर के पार गाँवों में गरीब परिवारों की संख्या अधिक है। आधे छोटे खेतों में फसल बो कर गुज़ारा करनेवाले हैं और आधे दूध बेचने का काम करते हैं। गाय, भैंसें पाल रखी हैं, जिनका दूध वे मुख्य राजमार्ग पर बसे शहर में बेचने जाते हैं।
शिक्षा से गाँव वालों का दूर-दूर तक को वास्ता नहीं है। ऐसा लगता था, कि नहर पार आधुनिक सभ्यता ने अपने पैर अभी तक नहीं रखे हैं। नहर से पहले गाँव में एक स्कूल है, जहाँ नहर पार गाँव के बच्चे इसलिए पढने जाते हैं, क्योंकि सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा और दोपहर का खाना मिलता है। इसके अतिरिक्त गाँव वाले अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते, जब को बच्चा फेल हो जाता है तो स्कूल से निकाल लिया जाता है।
इस सबके बावजूद कुछ बच्चों पर सरस्वती मेहरबान होती है, प्रकृति चाहती हैवे पढ़ लिख कर सभ्यता में अज्ञानता को दूर कर ज्ञान का प्रकाश चारों तरफ़ फैलाएँ। ऐसे ही बच्चों में रवीन्द्र प्रमुख था। गरीब परिवार का रवीन्द्र, खुद अपने बलबूते पर पढ़ता चला गया। जिस स्कूल का रिज़ल्ट कभी दस प्रतिशत से अधिक नहीं आया, रवीन्द्र दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम आया। स्कूल के प्रधानाचार्य ने रवीन्द्र की प्रतिभा का अवलोकन छोटी उम्र में ही कर लिया था, वह स्कूल की हर परीक्षा में प्रथम रहता था। जिले में प्रथम आने पर रवीन्द्र का उत्साह दुगना हो गया और अधिक लगन से पढ़ने लगा। प्रिंसिपल ने रवीन्द्र के लिए छात्रवृति के लिए आवेदन किया और दौड़भाग कर दो वर्ष के लिए छात्रवृति भी करवा दी। होनहार रवीन्द्र जोश, लगन और प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ता रहा और पढ़ाई के अंतिम शिखर पर पहुँचकर उसने अपना ध्यान आई ए एस की परीक्षा पास कर एक अधिकारी बनने पर केन्द्रित किया।
मुख्य राजमार्ग पर बसे गाँवो का अधिकरण सरकार करने लगी और एक औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई। छोटे उद्योगों के साथ एक विदेशी कंपनी ने कार बनाने के लिए ज़मीन ख़रीदी। कार बनाने के कारखाने का निर्माण शुरू हो गया। यह एक बड़ी परियोजना थी। गाँव के गरीब परिवारों को मज़दूरी मिल गई। दो साल बाद कारखाना तैयार हो गया और गाँव के सभी नौजवानों की भरती कार बनाने के कारखाने में हो गई।
बारहवी कक्षा की बोर्ड परीक्षा समाप्त हो गई और रिज़ल्ट आने में दो महीने का समय था। कारखाने में भरती पूरे जोश में थी। गाँव के दूसरे नौजवान कारखाने में भरती हो रहे थे, लेकिन रवीन्द्र ने अपना लक्ष्य आईएएस रख लिया था, वह नौकरी के लिए तैयार नहीं था। घर में खाली बैठे पुत्र को कोई बरदाश्त नहीं करता है। उसे घर देख माँ ने पिता से कहा, ''अजी सुनते हो, गाँव के सारे लड़के कारखाने में भरती हो रहे हैं। अपना रबी घर पड़ा है, कुछ बात करो उससे। अपना रबी तो प्रथम आता है, फेल लड़के सारे भरती हो गए हैं, सुना है पाँच-पाँच हज़ार रुपये महीना तनखाह मिल रही है, इसको तो अधिक तनखाह मिलेगी।
''तुम ठीक कहती हो, माँ, कल सरपंच भी कह रहा था, जल्दी भरती बंद हो जाएगी, ऐसे घर बैठे इतनी बढ़िया नौकरी के मौके कभी-कभी मिलते हैं।'' कह कर आवाज़ लगाई, ''रबी।''
''रबी परीक्षा समाप्त हो गई हैं, अब नौकरी कर ले, कारखाने में सब लड़के भरती हो गए है, यह सुनहरा अवसर है, इसको गँवाना नहीं है।''
''माँ मैं अभी पढ़ना चाहता हूँ, मुझे नौकरी नहीं करनी है।''
''तो क्या करेगा, रमाशंकर की आवाज़ तेज़ और कड़क हो गई।''
''मैं आईएएस अधिकारी बनना चाहता हूँ। उसके लिए अभी और पढ़ना है।''
''देख रबी, हम कोई अमीर नहीं हैं। हम पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते हैं।''
''आप खर्च की चिन्ता मत करें। प्रिंसिपल साहिब ने कहा है कि वे मेरी छात्रवृति की बात करेंगे।''
''देख रबी, तुझे घर के हालात तो मालूम है, तेरी दो बड़ी बहनों और भाई की शादी में कर्ज़ लिया था, जो आज तक चुका नहीं पाया, आधा खेत साहूकार पहले ही अपने नाम करवा चुका है। बाकी आधे खेत से बहुत मुश्किल से घर का गुज़ारा होता है। साल दो बाद छोटी बहन भी शादी लायक हो जाएगी। आखिर कैसे रकम का जुगाड़ करूँगा। घर बैठे बिठाए इतनी अच्छी नौकरी मिल रही है, तू अभी जा और भरती हो जा।''
''लेकिन मैं आगे नहीं बढ़ पाऊँगा। कारखाने की नौकरी में पूरी ज़िन्दगी क्लर्क बन कर रह जाऊँगा।''
''तो क्या लाटसाब बनेगा।'' रमाशंकर बिगड़ कर बोला।
''मैं आईएएस अफ़सर बनना चाहता हूँ।''
''मैं आगे पढूँगा।''
यह सुन कर रमाशंकर ने रवीन्द्र का हाथ पकड़ कर घर से बाहर कर दिया। माँ ने दरवाज़ा बंद कर दिया। रवीन्द्र अब क्या करे, कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह प्रिंसिपल के पास गया। स्कूल परिसर में दो कमरों का क्वार्टर रहने को मिला हुआ था। रवीन्द्र को प्रधानाचार्य ने अपने घर पनाह दी, यह सोचकर कि हो सकता है, दो चार दिन बाद रवीन्द्र के माता पिता का गुस्सा शान्त हो जाए, लेकिन उसके विपरीत उन्होनें गाँव वालो के संग प्रिंसिपल के घर धावा बोल दिया और खुले शब्दों में चेतावनी दे दी कि वह गाँव के बच्चों को भड़काना बंद कर दे वरना उसे स्कूल में रहने नहीं देंगे। वह रवीन्द्र को अपने घर में नहीं रख सकता है। मजबूर हो कर प्रिंसिपल के घर से रवीन्द्र को जाना पड़ा लेकिन वह घर नहीं गया। सीधे शहर के लिए रवाना हो गया। लेकिन समस्या रहने की थी, जाए तो कहाँ। कॉलिज के पास एक मंदिर था। वह वहाँ कुछ देर बैठा रहा। रात को मंदिर बंद हो गया। सारी रात मंदिर परिसर में गुज़ार दी। उसकी जेब में फूटी कोडी नहीं थी। बस एक पैंट कमीज़ में घर से निकला था। सुबह मंदिर की घंटियों की आवाज़ से उसकी नींद खुली। पानी पी कर गुज़ारा कर लिया। भक्तों का तांता लगा और कुछ भक्तों ने दिए प्रसाद से पेट की भूख शांत की। कॉलिज खुलने में अभी एक सप्ताह था। वह क्या करे, उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। दूसरी रात भी मंदिर में काटी। अगली सुबह मंदिर के पुजारी ने उसे देखा, कि वह सो रहा है। लात मार कर उसे उठाया।
''उठ कौन है तू, लाटसाब की तरह सो रहा है। बाप का घर समझ रखा है।''
घबड़ा कर रवीन्द्र उठा और अपनी राम कहानी सुना दी।
''मैं कैसे मानू कि तू सच बोल रहा है।'' पुजारी ने अपनी शंका जताई।
कुछ रुक कर प्रधानाचार्य ने रवीन्द्र से फिर पूछा, ''क्या अपने माता पिता से नाराज़ हो।''
''नहीं, प्रिंसिपल जी, लेकिन मैं वहाँ ट्रेनिंग के बाद जाऊँगा, मैं चाहता हूँ कि मेरे पास होने की ख़बर आप उन्हें दें।''
''आज तुम्हारा बेटा जिले का कलक्टर बन गया है, अगर तुम्हारी बात मान कर कारखाने की नौकरी करता तो अभी तक क्लर्की ही कर रहा होता। आज वह पूरे जिले का मालिक बन गया है।'' इससे पहले कि प्रधानाचार्य और अधिक कुछ कहते, पिता ने बात काट दी। ''हम तो मूर्ख थे, तभी तो आपकी बात नहीं समझ सके प्रिंसिपल साहब। हमने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, हमें माफ़ कर दो।''
''तुम गाँव निवासी अज्ञानता का पर्दा उतार दो, पढ़ाई की महिमा को समझो, यही मेरा सपना है। यही मेरी माफी है।''
रवीन्द्र पढने में मस्त था, शायद उसे अहसास था कि पिता कारखाने में नौकरी की बात करेंगे। इसलिए पिता की आवाज़ अनसुनी कर दी। रवीन्द्र को पढ़ता देख माँ बाप दोनों बाहर आ गए।
रवीन्द्र ने लाख समझाने की कोशिश की लेकिन सब बेकार, आखिर थक कर उसने कारखाने में नौकरी कर ली। रवीन्द्र को स्टोर में ड्यूटी दी गई, छ: हज़ार रूपये का वेतन पा कर घर वाले तो खुश हो गए, लेकिन रवीन्द्र का मन दु:खी था। कंपनी में दो हज़ार लोगों को रोज़गार मिला। रवीन्द्र स्टोर में बैठा वर्करों की वर्दी के कपड़ों के लिए थान में से नाप के अनुसार कपड़ा फाड़ के बाँटा करता था, इस काम से वह दु:खी था, लेकिन कुछ कर नहीं सकता था। दो महीने जैसे तैसे काटे। बारहवी कक्षा की बोर्ड परीक्षा का रिज़ल्ट घोषित हुआ। दसवी कक्षा में रवीन्द्र जिले में प्रथम आया था, इस बार वह पूरे राज्य में प्रथम रहा। राज्य सरकार ने आगे पढ़ने के लिए छात्रवृति की छोषणा की, जिससे उत्साहित होकर रवीन्द्र ने कॉलिज मे दाखिला लिया और नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने की ख़बर मिलते ही रवीन्द्र के माता पिता दोनों बहुत नाराज़ हुए और प्रिंसिपल को कोसने लगे।
''आग लगे नाशपीटे प्रिंसिपल को, रबी की बुद्धी ख़राब कर दी है, कहता है, नौकरी नहीं करेगा।'' माँ ने क्रुद्ध हो कर कहा तो जवाब में रमाशंकर खूँखार शेर की तरह दहाड़ने लगा, ''अभी जा कर हरामज़ादे प्रिंसिपल की ख़बर लेता हूँ। अपने को क्या समझता है।'' कह कर रमाशंकर तमतमाता हुआ घर से निकला और अपने साथ दो तीन पड़ोसियों को भी साथ ले लिया। प्रधानाचार्य को स्कूल परिसर में ही दो कमरों का क्वार्टर मिला हुआ था, जहाँ वह सपरिवार रहता था। वहाँ पहुँचते ही गालियों की बौछार के साथ प्रिंसिपल को खूब बुरा-भला कहा। प्रिंसिपल ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन को प्रभाव पड़ा। थक हार कर प्रिंसिपल ने कहा कि आपका लड़का है, जो आप उचित समझे, वही करें।
घर पहुँच कर रमाशंकर ने रवीन्द्र को हिदायत दी कि आगे पढ़ने की को ज़रूरत नहीं है, नौकरी दुबारा शुरू कर दे। रवीन्द्र को कुछ भी नहीं सूझ रहा था। वह प्रिंसिपल से मिला कि उसे क्या करना चाहिए, यदि वह नौकरी करता है, तब पढ़ाई को अलविदा कहना होगा। घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए परिवार के साथ रह कर आगे की पढ़ाई नहीं कर सकता है। घर से दूर रह कर अपना जीवन निर्वाह कैसे करेगा। प्रिंसिपल ने समझाया कि उसकी छात्रवृत्ति पढ़ाई का खर्च सहन कर लेगी, यदि वह अपने परिवार को समझा सके तो उसके भविष्य के लिए उत्तम रहेगा। लेकिन रवीन्द्र का परिवार अपने फ़ैसले पर अड़िग रहा।
''रबी कान खोल कर सुन ले। आगे पढ़ाई की कोई ज़रूरत नहीं है। नौकरी करेगा तो पैसे कमाएगा। पढ़ाई करेगा तो पैसे खर्च होंगे। जितने साल पढ़ने में लगाएगा, तब तक कम से कम दो लाख रूपये बचा लेगा। तू अब पढ़ लिख गया है, अपने आप हिसाब लगा ले। रोटी घर से निकल आएगी। पूरा वेतन बचाएगा।''
''उस पागल प्रिंसिपल की बातों में आ कर तू भी पागल बन गया है। लगता है, अपने पैरों पर कुल्हारी मारने का शौक हो रहा है, लेकिन कान खोल कर सुन ले रबी। इस घर में रहना है तो पढ़ने का भूत उतारना होगा।'' रमाशंकर ने धमकी दी।
लेकिन रवीन्द्र को पढ़ने की धुन थी, उसने कॉलिज में दाखिला ले लिया। यह सुनते ही रमाशंकर आगबबूला हो गया और रवीन्द्र को फिर धमकाया, ''आखिरी बार बोलता हूँ, घर में रहना है तो नौकरी कर ले वरना घर से बाहर हो जा।''
रवीन्द्र ने कॉलिज में दाखिले और छात्रवृति के काग़ज़ दिखाए तब पुजारी को यकीन हुआ कि रवीन्द्र सच बोल रहा है। पुजारी मंदिर परिसर में ठीक मंदिर के पीछे क्वार्टर में रहता था। उसने रवीन्द्र को मंदिर मे ठहरने की इज़ाज़त दे दी, लेकिन इसमें उसका अपना स्वार्थ था। पुजारी ने शर्त रख दी कि उसके दोनों बच्चों को पढ़ाना होगा और मंदिर की सफाई और छोटे मोटे सभी कार्य करने होगें। रवीन्द्र को सिर छुपाने की जगह मिल गई और उसने पुजारी की शर्ते मान ली। बेघर रवीन्द्र को घर मिला। सुबह चार बजे उठ कर मंदिर की सफाई करने, कॉलिज में पढ़ाई करने और शाम को पुजारी के बच्चों को पढ़ाने के बाद रवीन्द्र थक कर चूर हो जाता था और मंदिर के एक कोने में सो जाता था। उसे मंदिर के धार्मिक कार्यक्रमों में भी काम करना पढ़ता था, लेकिन उसकी आईएएस की लगन में को बाधा नहीं आई। प्रिंसिपल प्रधानाचार्य उसका मार्ग दर्शन करते रहे, हौसला बढ़ाते रहे। कॉलिज में वह सिर्फ़ पढ़ाई में ध्यान लगाता, जब कोई क्लास नहीं होती तो लाइब्रेरी में रहता था। सारे कॉलिज में मिस्टर पढ़ाकू के नाम से मशहूर हो गया। उसका कोई दोस्त नहीं बना।
जहाँ कॉलिज के लडके रोज़ नए फैशन के कपड़ों में नज़र आते और चमकती कारों, बाइकों में घूमते, वहीं दो जोड़ी पुराने कपड़ों में उसका दरिद्र्य झलकता था, पैदल आया जाया करता था, जिसके कारण को उसे अपने पास नहीं आने देता था। लेक्चरर और प्रोफ़ेसर ही उसके साथी थे। तमाम मुश्किलों के बीच प्रिंसिपल प्रधानाचार्य उसे लक्ष्य बताते रहे और कठिन डगर पर चलाते रहे। जिसका परिणाम पहले वर्ष ही नजर आ गया। पूरे कॉलिज में प्रथम रहा और उसके जितने अंक कॉलिज के इतिहास में किसी के नहीं आए थे। इसके बाद पढ़ने वाले छात्र उसके नज़दीक आने लगे और दोस्ती करने लगे। पुजारी के नालायक बच्चे भी अच्छे नंबरो से पास हुए। रवीन्द्र जिस कार्य को करता, पूरी लगन से करता, चाहे खुद पढ़ने का हो या पुजारी के बच्चों को पढ़ाने का हो। सुबह पूरे मंदिर की सफ़ाई कर चमका देता था, जिस कारण मंदिर की रौनक दुबारा लौट आई थी। भक्तों की संख्या बढ़ गई थी और पुजारी की आय। पढ़ने की लगन से वह पूरी यूनीवर्सिटी में प्रथम रहा और आईएएस की परीक्षा पहली कोशिश में मेरिट के साथ पास की।
''रवीन्द्र आज तुमने अपने नाम को सार्थक कर दिया। जैसे सूरज सारे जगत को प्रकाश देता है, वैसे रवि तुमने पढ़ने में नाम रौशन किया है। इस राह पर हमेशा चलते रहो, यही मैं चाहता हूँ।'' कह कर प्रधानाचार्य ने रवीन्द्र को गले लगा लिया। ''हमेशा सत्य की राह पर चलो, किसी रुकावट से मत डरना, यही मेरी शिक्षा है और तुम्हें आशीर्वाद है।''
ट्रेनिंग के बाद जहाँ बाकी आईएएस अफ़सरों ने विकसित शहरों में अपनी पोस्टिंग चाही, रवीन्द्र ने अपना पिछड़ा जिला चुना। पहला काम उसने नहर पर पुल बनवाने का किया। रवीन्द्र के माता पिता खुशी से फूले नहीं समाए, लेकिन इस चिन्ता में डूब गए कि उनका रबी मिलने क्यों नहीं आया, क्या वह नाराज़ है।
नहर पर पुल का काम तेज़ी से चल रहा था और गाँव वालों को अपने रबी से मिलने की बेताबी थी। आखिर वो घड़ी आ ही गई। पुल का उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री ने किया। आज पाँच साल बाद रवीन्द्र अपने गाँव जा रहा था। जीप धीरे-धीरे पुल से गुज़र रही थी, रवीन्द्र की आँखे नम होती जा रही थी। पूरा गाँव रवीन्द्र के स्वागत में खड़ा था। प्रधानाचार्य सबकी अगुवाई कर रहे थे। उन्होंने आगे बढ़ कर रवीन्द्र को गले लगाया। उसके बाद माता पिता ने अपने बेटे को गले लगाया। कोई कुछ नहीं कह सका। तीनों की आँखे नम थी। माँ रोती रोती बस इतना ही बुदबुदा सकीं ''मेरा रबी।'
रिक्शेवाले का बेटा बना IAS officer !
By : SONWANI
रिक्शेवाले का बेटा बना IAS officer !
अगर career के point of view से देखा जाए तो India में थ्री आइज़ (3 Is) का कोई मुकाबला नही:
IIT,IIM, और IAS. लेकिन इन तीनो में IAS का रुतबा सबसे अधिक है . हर साल लाखों परीक्षार्थी IAS officer बनने की चाह में Civil Services के exam में बैठते हैं पर इनमे से 0.025 percent से भी कम लोग IAS officer बन पाते हैं . आप आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि IAS beat करना कितना मुश्किल काम है , और ऐसे में जो कोई भी इस exam को clear करता है उसके लिए अपने आप ही मन में एक अलग image बन जाती है . और जब ऐसा करने वाला किसी बहुत ही साधारण background से हो तो उसके लिए मन में और भी respect आना स्वाभाविक है .
आज AKC पर मैं आपके साथ ऐसे ही एक व्यक्ति की कहानी share कर रहा हूँ जो हज़ारो दिक्कतों के बावजूद अपने दृढ निश्चय और मेहनत के बल पर IAS officer बना .
ये कहानी है Govind Jaiswal की , गोविन्द के पिता एक रिक्शा -चालक थे , बनारस की तंग गलियों में , एक 12 by 8 के किराए के कमरे में रहने वाला गोविन्द का परिवार बड़ी मुश्किल से अपना गुजरा कर पाता था . ऊपर से ये कमरा ऐसी जगह था जहाँ शोर -गुल की कोई कमी नहीं थी , अगल-बगल मौजूद फक्ट्रियों और जनरेटरों के शोर में एक दूसरे से बात करना भी मुश्किल था .
नहाने -धोने से लेकर खाने -पीने तक का सारा काम इसी छोटी सी जगह में Govind , उनके माता -पिता और दो बहने करती थीं . पर ऐसी परिस्थिति में भी गोविन्द ने शुरू से पढाई पर पूरा ध्यान दिया .
अपनी पढाई और किताबों का खर्चा निकालने के लिए वो class 8 से ही tuition पढ़ाने लगे . बचपन से एक असैक्षिक माहौल में रहने वाले गोविन्द को पढाई लिखाई करने पर लोगों के ताने सुनने पड़ते थे . “ चाहे तुम जितना पढ़ लो चलाना तो रिक्शा ही है ” पर गोविन्द इन सब के बावजूद पढाई में जुटे रहते . उनका कहना है . “ मुझे divert करना असंभव था .अगर कोई मुझे demoralize करता तो मैं अपनी struggling family के बारे में सोचने लगता .”
आस – पास के शोर से बचने के लिए वो अपने कानो में रुई लगा लेते , और ऐसे वक़्त जब disturbance ज्यादा होती तब Maths लगाते , और जब कुछ शांती होती तो अन्य subjects पढ़ते .रात में पढाई के लिए अक्सर उन्हें मोमबत्ती, ढेबरी , इत्यादि का सहारा लेना पड़ता क्योंकि उनके इलाके में १२-१४ घंटे बिजली कटौती रहती.
चूँकि वो शुरू से school topper रहे थे और Science subjects में काफी तेज थे इसलिए Class 12 के बाद कई लोगों ने उन्हें Engineering करने की सलाह दी ,. उनके मन में भी एक बार यह विचार आया , लेकिन जब पता चला की Application form की fees ही 500 रुपये है तो उन्होंने ये idea drop कर दिया , और BHU से अपनी graduation करने लगे , जहाँ सिर्फ 10 रूपये की औपचारिक fees थी .
Govind अपने IAS अफसर बनने के सपने को साकार करने के लिए पढ़ाई कर रहे थे और final preparation के लिए Delhi चले गए लेकिन उसी दौरान उनके पिता के पैरों में एक गहरा घाव हो गया और वो बेरोजगार हो गए . ऐसे में परिवार ने अपनी एक मात्र सम्पत्ती , एक छोटी सी जमीन को 30,000 रुपये में बेच दिया ताकि Govind अपनी coaching पूरी कर सके . और Govind ने भी उन्हें निराश नहीं किया , 24 साल की उम्र में अपने पहले ही attempt में (Year 2006) 474 सफल candidates में 48 वाँ स्थान लाकर उन्होंने अपनी और अपने परिवार की ज़िन्दगी हमेशा -हमेशा के लिए बदल दी .
Maths पर command होने के बावजूद उन्होंने mains के लिए Philosophy और History choose किया , और प्रारंभ से इनका अध्यन किया ,उनका कहना है कि , “ इस दुनिया में कोई भी subject कठिन नहीं है , बस आपके अनादर उसे crack करने की will-power होनी चाहिए .”
अंग्रेजी का अधिक ज्ञान ना होने पर उनका कहना था , “ भाषा कोई परेशानी नहीं है , बस आत्मव्श्वास की ज़रुरत है . मेरी हिंदी में पढने और व्यक्त करने की क्षमता ने मुझे achiever बनाया .अगर आप अपने विचार व्यक्त करने में confident हैं तो कोई भी आपको सफल होने से नहीं रोक सकता .कोई भी भाषा inferior या superior नहीं होती . ये महज society द्वारा बनाया गया एक perception है .भाषा सीखना कोई बड़ी बात नहीं है – खुद पर भरोसा रखो . पहले मैं सिर्फ हिंदी जानता था ,IAS academy में मैंने English पर अपनी पकड़ मजबूत की . हमारी दुनिया horizontal है —ये तो लोगों का perception है जो इसे vertical बनता है , और वो किसी को inferior तो किसी को superior बना देते हैं .”
गोविन्द जी की यह सफलता दर्शाती है की कितने ही आभाव क्यों ना हो यदि दृढ संकल्प और कड़ी मेहनत से कोई अपने लक्ष्य -प्राप्ति में जुट जाए तो उसे सफलता ज़रूर मिलती है . आज उन्हें IAS officer बने 5 साल हो चुके हैं पर उनके संघर्ष की कहानी हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी .
मकड़ी, चीँटी और जाला
By : SONWANI
एक मकड़ी थी. उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उसे आहार बनाउंगी और मजे से रहूंगी . उसने कमरे के एक कोने को पसंद किया और वहाँ जाला बुनना शुरू किया. कुछ देर बाद आधा जाला बुन कर तैयार हो गया. यह देखकर वह मकड़ी काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो उसे देखकर हँस रही थी.
मकड़ी को गुस्सा आ गया और वह बिल्ली से बोली , ” हँस क्यो रही हो?”
“हँसू नही तो क्या करू.” , बिल्ली ने जवाब दिया , ” यहाँ मक्खियाँ नही है ये जगह तो बिलकुल साफ सुथरी है, यहाँ कौन आयेगा तेरे जाले मे.”
ये बात मकड़ी के गले उतर गई. उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और जाला अधूरा छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी. उसने ईधर ऊधर देखा. उसे एक खिड़की नजर आयी और फिर उसमे जाला बुनना शुरू किया कुछ देर तक वह जाला बुनती रही , तभी एक चिड़िया आयी और मकड़ी का मजाक उड़ाते हुए बोली , ” अरे मकड़ी , तू भी कितनी बेवकूफ है.”
“क्यो ?”, मकड़ी ने पूछा.
चिड़िया उसे समझाने लगी , ” अरे यहां तो खिड़की से तेज हवा आती है. यहा तो तू अपने जाले के साथ ही उड़ जायेगी.”
मकड़ी को चिड़िया की बात ठीक लगीँ और वह वहाँ भी जाला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी अब कहाँ जाला बनायाँ जाये. समय काफी बीत चूका था और अब उसे भूख भी लगने लगी थी .अब उसे एक आलमारी का खुला दरवाजा दिखा और उसने उसी मे अपना जाला बुनना शुरू किया. कुछ जाला बुना ही था तभी उसे एक काक्रोच नजर आया जो जाले को अचरज भरे नजरो से देख रहा था.
मकड़ी ने पूछा – ‘इस तरह क्यो देख रहे हो?’
काक्रोच बोला-,” अरे यहाँ कहाँ जाला बुनने चली आयी ये तो बेकार की आलमारी है. अभी ये यहाँ पड़ी है कुछ दिनों बाद इसे बेच दिया जायेगा और तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी. यह सुन कर मकड़ी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा .
बार-बार प्रयास करने से वह काफी थक चुकी थी और उसके अंदर जाला बुनने की ताकत ही नही बची थी. भूख की वजह से वह परेशान थी. उसे पछतावा हो रहा था कि अगर पहले ही जाला बुन लेती तो अच्छा रहता. पर अब वह कुछ नहीं कर सकती थी उसी हालत मे पड़ी रही.
जब मकड़ी को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है तो उसने पास से गुजर रही चींटी से मदद करने का आग्रह किया .चींटी बोली, ” मैं बहुत देर से तुम्हे देख रही थी , तुम बार- बार अपना काम शुरू करती और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती . और जो लोग ऐसा करते हैं , उनकी यही हालत होती है.” और ऐसा कहते हुए वह अपने रास्ते चली गई और मकड़ी पछताती हुई निढाल पड़ी रही.
दोस्तों , हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार कुछ ऐसा ही होता है. हम कोई काम start करते है. शुरू -शुरू मे तो हम उस काम के लिये बड़े उत्साहित रहते है पर लोगो के comments की वजह से उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते है और जब बाद मे पता चलता है कि हम अपने सफलता के कितने नजदीक थे तो बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नही बचता.
रोशनी का टुकड़ा
By : SONWANI
सूरज की किरणें आकाश में अपने पंख पसार चुकी थीं। एक किरण खिड़की पर पड़े टाट के परदे को छकाती हुई कमरे के भीतर आ गई और सामने की दीवार पर छोटे से सूरज की भाँति चमकने लगी। पीले की बदरंग दीवार अपने उखड़ते हुए प्लास्टर को सँभालती हुई उस किरण का स्वागत कर रही थी।
बिस्तर पर पड़े-पड़े अनिमेष ने अपनी आँखें खोल कर एक बार उस किरण की ओर देखा और फिर आँखें मूँद कर उस अधूरे सपने की कड़ियों को पूरा करने की उधेड़बुन में जुट गया जिसे वह पिछले काफ़ी समय से देख रहा था, पर सपना था कि अपनी पिछली कड़ियों से जुड़ ही नहीं पा रहा था।
कई बार पुतलियों पर ज़ोर डालने के बावज़ूद जब सपना पूरा नहीं हुआ तो उसने अपनी आँखों को दुबारा खोला और दीवार पर पड़ती हुई किरण को देखने लगा। खिड़की से दीवार तक वह किरण वातावरण में उपस्थित छोटे-छोटे रेशों-रजकणों को प्रकाशित करती हुई दीवार पर स्थिर हो रही थी। कमरे का वह वातावरण जो नितांत गतिविधिहीन एवं शांत-सा लग रहा था, एक किरण मात्र के प्रवेश से गतिमान हो उठा था।
वास्तविकता तो यह थी कि किरण ने उस वेग को दृष्टि प्रदान कर दी थी जो अब तक दीप्यमान नहीं था।
बिस्तर पर पड़े-पड़े अनिमेष ने अपनी आँखें खोल कर एक बार उस किरण की ओर देखा और फिर आँखें मूँद कर उस अधूरे सपने की कड़ियों को पूरा करने की उधेड़बुन में जुट गया जिसे वह पिछले काफ़ी समय से देख रहा था, पर सपना था कि अपनी पिछली कड़ियों से जुड़ ही नहीं पा रहा था।
कई बार पुतलियों पर ज़ोर डालने के बावज़ूद जब सपना पूरा नहीं हुआ तो उसने अपनी आँखों को दुबारा खोला और दीवार पर पड़ती हुई किरण को देखने लगा। खिड़की से दीवार तक वह किरण वातावरण में उपस्थित छोटे-छोटे रेशों-रजकणों को प्रकाशित करती हुई दीवार पर स्थिर हो रही थी। कमरे का वह वातावरण जो नितांत गतिविधिहीन एवं शांत-सा लग रहा था, एक किरण मात्र के प्रवेश से गतिमान हो उठा था।
वास्तविकता तो यह थी कि किरण ने उस वेग को दृष्टि प्रदान कर दी थी जो अब तक दीप्यमान नहीं था।
समय कितनी तेज़ी से बीतता है। रमन का ब्याह हो गया था और उसने वहीं इलाहाबाद में एक मेडिकल स्टोर खोल लिया था। कल का अन्नी आज का अनिमेष भगत बन चुका था। अनिमेष भगत एक बेरोज़गार, जिसने नौकरी के लिए अपने अलग मापदंड बना रखे थे, एक पुत्र जो अब घर से पैसे मँगाने में शर्म का अनुभव करने लगा था, एक गुमनाम लेखक जिसकी रचनाओं को नगर का कोई भी बड़ा पत्र छापने को तैयार नहीं होता था। वास्तव में अनिमेष अपने भीतर छिपे लेखक को अपने सबसे निकट पाता, धीरे-धीरे घर से पैसे माँगने में शर्म आनी ख़त्म सी होती जा रही थी, वैसे भी अब घरवाले पैसे देने में हिचकिचाने लगे थे। वह चार बार माँगता तो कभी एक बार पैसे आते तो कभी वो भी ना आते। बेरोज़गारी तो अपनी आदत ही डाल चुकी थी। वैसे भी वह लेखक ही था जिसकी बदौलत वह अपनी थोड़ी-सी ज़रूरतों को पूरा करने भर के पैसे जुटा पाता। इलाहाबाद से दिल्ली आए उसे लगभग तीन वर्ष बीत चुके थे। नौकरी की तलाश उसे यहाँ खींच लाई थी, उसने सुना था कि दिल्ली में आने वाले वर्षों में दो लाख से भी अधिक लोगों को रोज़गार उपलब्ध होगा। नौकरियाँ थीं अभियंताओं के लिए, बावर्चियों के लिए, मज़दूरों के लिए, तकनीशियनों के लिए, अंग्रेज़ी को अंग्रेज़ों की तरह बोलने वालों के लिए, पर हिंदी के स्नातक के लिए कोई जगह किसी के पास नहीं थी। इधर उधर प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में कुछ लिख लिखा कर वह अपना जीवन यापन कर रहा था।
समय के साथ पत्रकारिता ने अपना स्वरूप बदला है। समाचार पत्र पढ़ने के स्थान पर अब लोग न्यूज़ चैनल्स पर जीवंत समाचार देखना अधिक पसंद करते हैं। आज के समय में लेखक की जो स्थिति है वो भी किसी से छिपी नहीं है। पत्रकारिता के क्षेत्र में जो बदलाव आया है उसकी तीव्र गति में अनेक लेखक और कवि ऐसे हैं जो अचानक पीछे छूट गए हैं। अनिमेष लिखता तो अच्छा था परंतु नवयुग जिस गति और जिस लयात्मकता की माँग उससे करता वह उसके पास न थी। संपादक चाहते थे कि वह कुछ चटपटा लिखे, कुछ ऐसा जिसको पढ़कर उत्तेजना पैदा की जा सके पर वह जो लिखता था उसको यह कहकर नहीं छापा जाता था कि ऐसा तो पहले भी बहुत बार लिखा जा चुका है।
इस सबके बावजूद नगर में छपने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र ''उजागर'' में अनिमेष की रचना अवश्य छपती थी। प्रत्येक रविवार को प्रकाशित होने वाले इस पत्र में लेख, कहानी, कविता या जो कुछ भी उसने लिखा होता वह छप जाता और दो सौ रुपए अनिमेष के हाथ पर रख दिए जाते। इस पत्र के संपादक थे श्रीमान राकेश पराशर। अनिमेष आज तक संपादक जी के इस स्नेह को समझ नहीं पाया था, न तो वह उनकी जाति का था, न उनके क्षेत्र से था और न ही संपादक महोदय को कोई लाभ पहुँचाने की स्थिति में ही था, फिर भी उसकी रचनाएँ निर्बाध रूप से छपती आ रही थीं।
ऐसा सुनते हैं कि राकेश जी भी बहुत दिनों तक अपनी रचनाओं को छपवाने हेतु इधर उधर भेजते रहे थे और अंतत: थक हार कर उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस का काम शुरू किया। काम अच्छा चल पड़ा तो अंदर छिपे लेखक ने एक बार फिर अंगड़ाइयाँ लेना प्रारंभ कर दिया तथा उन्होंने अपने स्वयं के अख़बार ''उजागर'' की नींव रखी। आस-पास के परिचित दुकानदारों से कुछ विज्ञापन मिल जाते और बाकी पैसे वे अपनी जेब से लगाते थे। नए लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करने में उन्हें आनंद आता था। सुनते तो ऐसा भी हैं कि आजकल के कुछ प्रतिष्ठित लेखक उनके आँगन से होकर ही अपने लक्ष्य तक पहुँचे हैं परंतु उन लेखकों के नाम किसी को पता नहीं थे। अनिमेष को ऐसा नहीं लगता था कि वह भी दूसरे प्रसिद्ध लेखकों की तरह यहीं से अपने आपको लेखन की दुनिया में सिद्ध कर सकेगा।
अनिमेष को कई बार यह सोचकर दुख होता था कि उसकी रचनाओं को बहुत कम लोग ही पढ़ते थे। कलम से क्रांति का जो स्वप्न वह एक अरसे से देखता आ रहा था वह उसको टूटता-सा लगता। ''उजागर'' की कुल दो हज़ार प्रतियाँ छपती थीं जिसमें से अधिकतर आस पास के दुकानदारों में मुफ़्त बाँट दी जातीं और बाकी प्रेस से ही कबाड़ी वाले के पास पहुँच जातीं। स्कूलों के बाहर खड़े फेरीवाले आमतौर पर ''उजागर'' पर ही चने कुरमुरे आदि बेचते थे। कुल सौ-दो सौ प्रतियाँ ही असली पाठकों तक पहुँचतीं जिसमें से अधिकतर मुख्य ख़बरों के आगे कम ही बढ़ते थे। ऐसे में चौथे पृष्ठ पर छपने वाले लेख को कितने लोग पढ़ते होंगे यह कहना कठिन नहीं था।
अनिमेष अन्य नामी-गिरामी पत्रों में भी यदा-कदा अपनी रचनाएँ भेजता रहता था। परंतु उन पत्रों ने तो जैसे उसकी रचनाओं को न छापने की कसम खा रखी थी। ''दैनिक प्रकरण'' से कल ही उसका लेख वापस आया था, वह लेख जो उसने हिंदू मुस्लिम एकता पर लिखा था, इसी एकता की कड़ियों में उलझकर एक लिफ़ाफ़े के रूप में उसके सिरहाने पड़ा था। अलसाए हुए अनिमेष ने एक दृष्टि उस लिफ़ाफ़े की ओर डाली, उठकर टूथपेस्ट को अपने ब्रश में लगाया तथा कमरे से बाहर निकल आया। बरामदे में लगे आईने पर जब उसकी नज़र पड़ी तो अपनी आँखों के नीचे उभरती हुई कालिख को देखकर वह एक बार ठिठका और फिर मन ही मन अपने आपसे कुछ कहता हुआ आगे बढ़ा।
"उठो भाई एक और दिन तैयार है तुमसे दो-दो हाथ करने के लिए। अभी बाबूलाल भी किराया-किराया चिल्लाता हुआ आ रहा होगा। यहाँ आँखों के नीचे तो ऐसी कालिख जम रही है कि मानो रात भर इन्होंने कोयले की खान में काम किया हो। अम्मा अगर इस हालत में देख लें तो पहचान भी ना पाएँ। चलूँ, राकेश जी को ये लेख देता हूँ जाकर, एक वही हैं जो इसको छाप सकते हैं वरना यदि बाकी पत्रों का बस चले तो हिंदू मुस्लिम एकता को शब्दकोष से ही बाहर करवा दें।"
खैऱ, चाहे जितने लोग उस अख़बार को पढ़ते हों पर कोई एक पाठक ऐसा था जो एक पोस्टकार्ड पर अपनी प्रतिक्रिया लिखकर अवश्य भेजता था। पच्चीस पैसे का वह पोस्टकार्ड भले ही हज़ारों का ना होता हो पर अनिमेष के लिए वह दो सौ रुपए का तो हो ही जाता क्यों कि उसको पाने के बाद ही वह अपने अगले लेख को लिखने की हिम्मत जुटा पाता। अनिमेष को ऐसा लगता कि यदि कोई उसकी रचना पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है तो हो ना हो कहीं ना कहीं उसकी कलम अपने उद्देश्य में सफल हो रही है। कमरे में वापस आकर उसने एक बार फिर पोस्टकार्ड को देखा, "प्रिय लेखक जी, आज आपका लेख पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ऐसी मनोहारी रम्य रचना पढ़े एक अरसा बीत गया था। भ से भारत, भ से भूख और भ से भ्रष्टाचार की श्रृंखलाओं को आपने एक कुशल चितेरे की तरह अपने कैनवस पर उतारा है। लेख की भाषा और शैली भी बहुत अच्छी लगी। व्यंग्यात्मकता के पुट के कारण लेख और भी सुंदर बन पड़ा है। आशा है कि आगे भी आप ऐसे ही उत्तम लेखों से हम पाठकों की तृष्णा को शांत करते रहेंगे। आपका पाठक
अब तक कम से कम बीस बार वह इसको पढ़ चुका था। पर उसे ऐसा लगता मानो प्रशंसा अथवा प्रतिक्रिया के यह शब्द उसको असीम शक्ति प्रदान कर रहे हों। कभी-कभी तो उसको ऐसा लगता कि यदि यह पोस्टकार्ड उसके पास ना आए तो वह आगे कुछ भी लिख ना पाए। वैसे वह यह भी जानता था कि उसका ऐसा सोचना एक अंधविश्वास से अधिक कुछ भी नहीं था परंतु ऐसा अंधविश्वास जिससे व्यक्ति को प्रेरणा मिलती हो, विश्वास करने योग्य होता है। पोस्टकार्ड के अक्षर-अक्षर को एक बार पुन: अपने मानस में बिठाकर अनिमेष ने अपनी सायकिल उठाई और ''उजागर'' के दफ़्तर की ओर बढ़ चला। कुछ ही समय में अपने लेख को बगल में दबाए वह राकेश जी के सामने खड़ा था। उसने लेख को राकेश जी के आगे बढ़ाया, राकेश ने अनिमेष की आँखों में आँखें डालते हुए कहा,
"अरे, ये खेद सहित का पर्चा तो हटा देते। कितनी बार समझाया है तुम्हें कि तुम हमारे पेटेंट लेखक हो, मगर तुम मानते नहीं हो। बडे पत्रों में छपने के लिए बड़ा नाम, बड़ी जान पहचान का होना बहुत आवश्यक है। लिफ़ाफ़ा वापस आने पर होने वाले दुख से मैं भी परिचित हूँ पर ऐसे ही कोई प्रेमचंद थोड़े ही बन जाता है। देखूँ तो क्या लिखा है तुम्हारी आग उगलती धारदार कलम ने, हमम ह़िंदु मुस्लिम बढ़िया है, छप जाएगा, ये लो भाई हमारा आशीर्वाद।" इतना कहते हुए उन्होंने दो सौ रुपए अनिमेष को पकड़ा दिए। अनिमेष रुपए लेकर चुपचाप अपने घर की ओर चल पड़ा।
अनिमेष के जीवन में एक और बड़ा ही महत्वपूर्ण प्राणी था, उसका मकान मलिक बाबूलाल जो उसके कमरे के सामने वाले कमरे में ही रहता था। कभी वह किसी से बोलता तो ऐसे मानो कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो। उसकी बातचीत को झगड़े में बदलते ज़्यादा समय नहीं लगता था। पिछले चार महीनों में अनिमेष को कई बार बत्ती जलती छोड़ देने की वजह से फटकार पड़ चुकी थी। कमरे का किराया पाँच सौ रुपए था, कमरे के अलावा एक कुर्सी, एक मेज़ और एक तखत भी उस कमरे में पहले से पड़े थे, बिजली का अलग से कुछ नहीं लिया जाता था अत: यदि बाबूलाल बिना मतलब बत्ती जलती देख लेता तो आगबबूला हो उठता। इधर हमारे लेखक बाबू को लिखते-लिखते सोने की आदत थी, तो सामन्यत: कई बार लाईट बुझाना भूल भी जाते थे।
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